Monday, October 5, 2009


The Nobel Prize in Physiology or Medicine 2009

"how chromosomes are protected by telomeres and the enzyme telomerase"



This year's Nobel Prize in Physiology or Medicine is awarded to three scientists who have solved a major problem in biology: how the chromosomes can be copied in a complete way during cell divisions and how they are protected against degradation. The Nobel Laureates have shown that the solution is to be found in the ends of the chromosomes – the telomeres – and in an enzyme that forms them – telomerase.
The long, thread-like DNA molecules that carry our genes are packed into chromosomes, the telomeres being the caps on their ends. Elizabeth Blackburn and Jack Szostak discovered that a unique DNA sequence in the telomeres protects the chromosomes from degradation. Carol Greider and Elizabeth Blackburn identified telomerase, the enzyme that makes telomere DNA. These discoveries explained how the ends of the chromosomes are protected by the telomeres and that they are built by telomerase.
If the telomeres are shortened, cells age. Conversely, if telomerase activity is high, telomere length is maintained, and cellular senescence is delayed. This is the case in cancer cells, which can be considered to have eternal life. Certain inherited diseases, in contrast, are characterized by a defective telomerase, resulting in damaged cells. The award of the Nobel Prize recognizes the discovery of a fundamental mechanism in the cell, a discovery that has stimulated the development of new therapeutic strategies.

Telomeres delay ageing of the cell

Scientists now began to investigate what roles the telomere might play in the cell. Szostak's group identified yeast cells with mutations that led to a gradual shortening of the telomeres. Such cells grew poorly and eventually stopped dividing. Blackburn and her co-workers made mutations in the RNA of the telomerase and observed similar effects in Tetrahymena. In both cases, this led to premature cellular ageing – senescence. In contrast, functional telomeres instead prevent chromosomal damage and delay cellular senescence. Later on, Greider's group showed that the senescence of human cells is also delayed by telomerase. Research in this area has been intense and it is now known that the DNA sequence in the telomere attracts proteins that form a protective cap around the fragile ends of the DNA strands.

An important piece in the puzzle – human ageing, cancer, and stem cells

These discoveries had a major impact within the scientific community. Many scientists speculated that telomere shortening could be the reason for ageing, not only in the individual cells but also in the organism as a whole. But the ageing process has turned out to be complex and it is now thought to depend on several different factors, the telomere being one of them. Research in this area remains intense.
Most normal cells do not divide frequently, therefore their chromosomes are not at risk of shortening and they do not require high telomerase activity. In contrast, cancer cells have the ability to divide infinitely and yet preserve their telomeres. How do they escape cellular senescence? One explanation became apparent with the finding that cancer cells often have increased telomerase activity. It was therefore proposed that cancer might be treated by eradicating telomerase. Several studies are underway in this area, including clinical trials evaluating vaccines directed against cells with elevated telomerase activity.

Some inherited diseases are now known to be caused by telomerase defects, including certain forms of congenital aplastic anemia, in which insufficient cell divisions in the stem cells of the bone marrow lead to severe anemia. Certain inherited diseases of the skin and the lungs are also caused by telomerase defects.
In conclusion, the discoveries by Blackburn, Greider and Szostak have added a new dimension to our understanding of the cell, shed light on disease mechanisms, and stimulated the development of potential new therapies.
Elizabeth H. Blackburn has US and Australian citizenship. She was born in 1948 in Hobart, Tasmania, Australia. After undergraduate studies at the University of Melbourne, she received her PhD in 1975 from the University of Cambridge, England, and was a postdoctoral researcher at Yale University, New Haven, USA. She was on the faculty at the University of California, Berkeley, and since 1990 has been professor of biology and physiology at the University of California, San Francisco.
Carol W. Greider is a US citizen and was born in 1961 in San Diego, California, USA. She studied at the University of California in Santa Barbara and in Berkeley, where she obtained her PhD in 1987 with Blackburn as her supervisor. After postdoctoral research at Cold Spring Harbor Laboratory, she was appointed professor in the department of molecular biology and genetics at Johns Hopkins University School of Medicine in Baltimore in 1997.
Jack W. Szostak is a US citizen. He was born in 1952 in London, UK and grew up in Canada. He studied at McGill University in Montreal and at Cornell University in Ithaca, New York, where he received his PhD in 1977. He has been at Harvard Medical School since 1979 and is currently professor of genetics at Massachusetts General Hospital in Boston. He is also affiliated with the Howard Hughes Medical Institute.

Monday, September 21, 2009

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के आखिरी पल

सुप्रिया रॉय

शहीद भगत सिंह होते तो इस महीने की 27 तारीख को 98 साल के हो गए होते। मगर उन्होंने शहीद होने का रास्ता खुद चुना था। यह बात अलग है कि ब्रिटिश सरकार उनसे इतनी नफरत करती थी कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखेदव को फांसी दी गई, मरने से पहले ही उतार लिया गया, जेल से बाहर निकाल कर गोली से उड़ाया गया और गोली मारने की बात सही साबित न हो जाए इसलिए पोस्टमार्टम तक नहीं करवाया गया। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था बल्कि उनकी हत्या की गई थी। एक गलतफहमी यह भी है कि इन तीनों को तत्कालीन संविधान सभा में बम फेंकने के आरोप में मृत्यु दंड दिया गया। सच यह है कि साइमन कमीशन के खिलाफ शांतिपूर्वक जुलूस निकाल रहे लाला लाजपत राय के सिर पर लाठी मार कर उन्हें मार डालने वाले ब्रिटिश पुलिस अधिकारी स्कॉट से बदला लेने के लिए इन तीनों ने योजना बनाई थी लेकिन गलतफहमी में उनके डीएसपी जेपी सांडर्स को मार डाला था। सांडर्स की हत्या के आरोप में इन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। 23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने ऑपरेशन ट्रोजन हॉर्स के नाम से एक नाटक खेला। लाहौर जेल में सारे नियम तोड़ते हुए रात को सात बजे भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी पर चढ़ाया गया। इसके पहले कि उनके प्राण निकल पाते, इन तीनों को फंदों से उतार लिया गया और फिर लाहौर छावनी के पास इन तीनों को गोली से उड़ाया गया। अगर पोस्टमार्टम होता तो शरीर से गोलियां बरामद होती और पोल खुल जाती इसलिए पोस्टमार्टम नहीं किया गया। लंदन के अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेजों में यह तथ्य मौजूद हैं। भारत सरकार पता नहीं क्यों इन दस्तावेजों को लाने से या मंगाने से इंकार कर रही है। आम तौर पर सभी यह विश्वास करते हैं कि महात्मा गांधी हालांकि नौजवान भगत सिंह की बहादूरी के प्रशंसक थे और उन्होंने यह भी कहा था कि वे भगत सिंह के या किसी के भी मृत्यु दंड के खिलाफ हैं मगर उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार को अपने अभियुक्तों को अपने नियमों के अनुसार फांसी देने का पूरा अधिकार है। वैसे गांधी जी ने कहा था कि किसी का जीवन लेने का अधिकार सिर्फ ईश्वर को है क्योंकि वही जीवन देता है। इस तरह की टोटकेबाजी हमारे राष्ट्रपिता करते रहते थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी इस मामले का वर्णन नहीं किया है। सत्य के साथ उनके प्रयोग इस मामले में अधूरे है। गांधी चाहते तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की जान बचा सकते थे। आखिर उन्होंने लार्ड इरविन से समझौता कर के सत्याग्रह करने वाले नब्बे हजार राजनैतिक कैदियों को छुड़वाया ही था। ऐसा नहीं कि गांधी ने कोशिश नहीं की हो। मगर यह कोशिश निर्णायक नहीं थी। 19 मार्च 1931 को गांधी खुद लार्ड इरविन से मिले थे और फांसी की सजा माफ करने के लिए कहा था। इसके बाद उन्होंने ठीक फांसी वाले दिन वायसराय को एक पत्र भी लिखा था और कहा था कि फांसी माफ कर दी जाए। मगर यह पत्र वायसराय की मेज तक पहुंचता इससे पहले ही रात को ही इन तीनों क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़ा दिया गया। ब्रिटिश गुप्तचर ब्यूरो के दस्तोवज भारत को मंगाने जरूरी है। हालांकि भारत में नेहरू गांधी परिवार के अलावा किसी को आजादी का सिपाही नहीं माना जाता और इसीलिए पंजाब में भगत सिंह के गांव खटकड़कलां में सड़क के किनारे भगत सिंह का एक स्मारक बना दिया गया है और उन्हें भुला दिया गया है। 2007 में प्रकाशित एक पुस्तक में इन दस्तावेजों का वर्णन है और इसमें भगत सिंह और उनके साथियों की मौत और उनके अंतिम संस्कार के बारे में कई सवाल उठाए गए हैं। इस किताब के मुख्य स्रोत दिलीप सिंह अलाहाबादी हैं जो एक जमाने में नेहरू जी के घर आनंद भवन इलाहबाद में माली हुआ करते थे और उनके बारे में कहानी प्रचलित है कि एक जुलूस में उन्होंने नेहरू जी को थप्पड़ भी जड़ दिया था। यह भी कहा जाता है कि वे खुद ब्रिटिश सरकार के लिए जासूसी करने लगे थे और बाद में खुद इंग्लैंड चले गए थे। वहां जा कर उन्होंने कुलवंत सिंह नाम के एक बच्चे को गोद लिया था जो डर्बी शहर में रहता है। अलाहाबादी की मृत्यु 1986 में हो गई थी मगर वे अपने पीछे बहुत सारी डायरियां और दस्तावेज छोड़ गए थे। 1992 में कुलवंत सिंह ने इस किताब पर काम शुरू किया और उनके सामने चौकाने वाली जानकारियां सामने आई। वे ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन में जा कर कई दस्तावेज खुद देख कर आए। उनकी शोध से जो कहानी निकलती है उसके अनुसार ऑपरेशन ट्रोजन हॉर्स इसलिए रचा गया था क्योंकि सांडर्स के वद से पुलिस वाले और खास तौर पर सांडर्स के परिवार वाले बहुत आहत थे। इसीलिए इन तीनों क्रांतिकारियों को फांसी पर सिर्फ गर्दन की हड्डी टूटने तक लटकाया गया और फिर लाहौर छावनी के पास जिन लोगों ने इन आधे मुर्दा शहीदों पर गोलियां चलाई उनमें से सांडर्स के परिवार वाले भी थे। भारत में हमेशा से सुबह तड़के फांसी देने का रिवाज है। कानून भी यही कहता है। मगर प्रतिशोध का यह पाखंड फिरंगियों को करना था और दिन में ऐसा करने से पूरी दुनिया को पता लग जाता, इसलिए सांडर्स के परिवार को प्रसन्न करने के लिए रात सात बजे का फांसी का अभिनय किया गया। दरअसल जब भगत सिंह के पास उनके जल्लाद पहुंचे तो वे लेनिन की एक किताब पढ़ रहे थे। उन्हें बताया गया कि उनका अंत समय आ गया है और उन्हें गुरुबानी पढ़नी चाहिए। भगत सिंह ने कहा कि आखिरी वक्त पर भगवान को याद किया तो मुझे कायर माना जाएगा और वैसे भी मैं एक क्रांतिकारी के बारे में पढ़ रहा हूं। किताब के आखिरी पन्ने खत्म कर के वे उठे और फांसी के फंदे पर पहुंच कर इंकलाब ंजिंदाबाद का नारा लगा दिया। इसके पहले नियमानुसार परिवार वालों से उनकी आखिरी मुलाकात भी नहीं करवाई गई थी। और तो और रहस्य छुपा रहे इसलिए जिस जल्लाद ने फांसी दी थी उसे भी फौरन मार डाला गया। तीनों को गोलियों से भुनने के बाद एक लॉरी में सतलज और ब्यास नदियों के संगम पर हुसैनीवाला के पास निपट एकांत में आधी रात के आसपास चिता पर नहीं, मिट्टी का तेल डाल कर जलाया गया। भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर कहानी सुनते ही वहां पहुंची और पाया कि अधजली हड्डियां वहां पड़ी हुई हैं और उन्हें उठा कर लाई और लाहौर में रावी नदी के किनारे अच्छी खासी भीड़ के सामने उनका विधिवत अंतिम संस्कार किया गया। पता नहीं इस बात में कितना दम है कि जब जेल से बेहोश भगत सिंह को लाया जा रहा था तो उन्हें हल्का सा होश आया। उस समय पंजाब के गवर्नर के सचिव सांडर्स के ससुर थे और उन्हें भी भगत सिंह के सिर सीने में गोलिया मारने दी गई। पंजाब सीआईडी के एसपी वीएन स्मिथ के संस्मरण ब्रिटिश लाइब्रेरी में माइक्रोफिल्म पर मौजूद है और उन्हें आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। मगर फिर सवाल उठता है कि सच जानना कौन चाहता है और सच क्या वास्तव में सबको पता नहीं है

The questions raised by Madam Supriya Ray in her article at Dateline india are quite serious and wants a serious thought of all the indians who presently knows from the class textbooks that they were hanged in relation with the asambly blast case. can anybody throughs more light on this issue.

thank you Supriya ji for informing us the story of our freedom fighters with a different angle